Tuesday, April 21, 2026
Tuesday, April 21, 2026
HomePOLITICSबेअदबी विरोधी कानून पर सुखबीर बादल की चुप्पी बुनियादी सवाल खड़े करती...

बेअदबी विरोधी कानून पर सुखबीर बादल की चुप्पी बुनियादी सवाल खड़े करती है: बलतेज पन्नू

जिन लोगों ने सालों तक बेअदबी का राजनीतिक फ़ायदा उठाया, अब कानून लागू होने के बाद उनके पास कोई शब्द नहीं बचा है: बलतेज पन्नू

आप सरकार ने कुछ ही दिनों में एक अहम कानून दे दिया, जिसे अकाली-भाजपा और कांग्रेस ने सालों तक लटकाए रखा: बलतेज पन्नू

इतिहास याद रखेगा कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की मर्यादा के लिए कौन खड़ा हुआ और किसने चुप्पी और गैरहाज़िरी को चुना: बलतेज पन्नू

एसजीपीसी की मीटिंग के बाद धामी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की क्योंकि सुखबीर बादल का ‘सिपाही’ तब तक नहीं बोल सकता जब तक बादल खुद चुप न हों: बलतेज पन्नू

आम आदमी पार्टी (आप) पंजाब के मीडिया इंचार्ज बलतेज पन्नू ने ‘जगत जोत गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार बिल, 2026’ पर शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर बादल की लगातार चुप पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे समय जब बेअदबी को रोकने के लिए सख्त कानून बनाया है, अकाली दल द्वारा कोई जवाब न आना कई गंभीर राजनीतिक सवाल खड़े करता है।

सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आप पंजाब के स्टेट जनरल सेक्रेटरी और मीडिया इंचार्ज बलतेज पन्नू ने कहा कि आप की पंजाब सरकार ने बेअदबी की घटनाओं को रोकने के लिए सख्त कानून लाकर अपना वादा पूरा किया है, लेकिन जो लोग ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति करते थे, वे अब चुप रहना पसंद कर रहे हैं। यह चुप्पी राजनीतिक रूप से बहुत कुछ कहती है।

आप पंजाब के जनरल सेक्रेटरी ने आगे कहा कि जब भगवंत मान सरकार ने बेअदबी के खिलाफ सख्त कानून लाने का ऐलान किया था, तो विरोधी पार्टियों ने इसे राजनीतिक बयानबाजी कहकर खारिज कर दिया था। वे कहते थे, ‘कानून लाओ, फिर देखेंगे।’ आज यह कानून न सिर्फ पास हो गया है बल्कि पूरी तरह से लागू भी हो गया है, और वही लोग अब शांत हो गए हैं।

बलतेज पन्नू ने कहा कि नए कानून में बेअदबी के कामों के लिए सख्त सज़ा का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि कानून में उम्रकैद और 25 लाख रुपये तक के जुर्माने जैसे कड़े प्रावधान हैं, जो सज़ा और डर दोनों पक्का करते हैं।

पिछली सरकारों पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि अकाली-भाजपा गठबंधन और कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार बेअदबी पर कोई असरदार कानून बनाने में नाकाम रही, हालांकि वे ऐसे बिल लाए जो कभी कानून बनने के लिए नहीं थे। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि राजनीतिक फायदे के लिए यह मुद्दा ज़िंदा रहे। कुछ लोगों ने इस मुद्दे पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकीं और वे चाहते थे कि यह सिलसिला चलता रहे।

पिछली घटनाओं का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि चाहे 2015 की घटनाएं हों, 1986 में नकोदर की घटना हो या 1978 की, हर कोई जानता है कि उस समय सत्ता में कौन था और वे कैसे कोई अहम कार्रवाई करने में नाकाम रहे। 2015 की बेअदबी की घटनाओं के दौरान, बार-बार उकसाने और धमकियों के बावजूद, उस समय की सरकार असरदार तरीके से कार्रवाई करने में नाकाम रही। महीनों तक गाली-गलौज वाले पोस्टर लगाए गए, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

बलतेज पन्नू ने पिछली सरकारों के जांच के तरीकों की भी आलोचना की और कहा कि जस्टिस ज़ोरा सिंह कमिशन और जस्टिस रणजीत सिंह कमिशन जैसे कमिशन की रिपोर्ट को नज़रअंदाज़ किया गया। गंभीर नतीजों को मामूली बताया गया और रिपोर्ट की कॉपियां सार्वजनिक तौर पर बहुत कम कीमत पर बांटी गईं।

कानून बनाने के प्रक्रिया पर उन्होंने कहा कि आप सरकार ने बिल का मसौदा तैयार करने से पहले कानूनी माहिरों और धार्मिक नेताओं से काफी सलाह-मशविरा किया था। यह कोई जल्दबाज़ी में लिया गया फ़ैसला नहीं था, बल्कि कड़ी सज़ा देने और डर पैदा करने के मकसद से बनाया गया एक मज़बूत कानूनी ढांचा है।

बलतेज पन्नू ने कहा कि कानून पास होने के बाद भी, न तो शिरोमणि अकाली दल और न ही उसकी लीडरशिप ने इसके समर्थन या विरोध में कोई आधिकारिक बयान जारी किया है। एसजीपीसी प्रधान हरजिंदर सिंह धामी की चुप्पी भी उतनी ही चिंताजनक है। एसजीपीसी मीटिंग के बाद प्रेस से बात न करना राजनीतिक दबाव और स्पष्टता की कमी को दिखाता है।

उन्होंने आगे कहा कि अकाली दल का इकलौता विधायक भी विधानसभा के उस स्पेशल सेशन में शामिल नहीं हुआ, जहाँ यह बिल पास हुआ था। इतिहास में यह दर्ज होगा कि गुरु ग्रंथ साहिब की मर्यादा की रक्षा के लिए कौन खड़ा हुआ और किसने गैरहाजिर रहना चुना।
बलतेज पन्नू ने कहा कि 13 अप्रैल को बिल पेश होने से लेकर 17 अप्रैल को राज्यपाल की मंज़ूरी और 20 अप्रैल तक नोटिफिकेशन जारी होने तक, यह ‘आप’ सरकार की मज़बूत राजनीतिक इच्छाशक्ति को दिखाता है। कुछ ही दिनों में यह कानून पूरी तरह से बन गया और लागू हो गया, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। सुखबीर सिंह बादल की चुप्पी दिखाती है कि वह पंजाब और उसकी धार्मिक भावनाओं के लिए मज़बूती से खड़े होने के बजाय अपने निजी और राजनीतिक हितों की रक्षा पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं।

RELATED ARTICLES
- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments