भारत में घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत पड़ोसी देशों की तुलना में कम है और अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया तथा कनाडा जैसे विकसित देशों की तुलना में भी काफी सस्ती है।
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) के लाभार्थियों को हर वर्ष पहले चार रीफिल पर प्रति सिलेंडर ₹300 की सहायता मिलेगी। इस प्रकार प्रत्येक लाभार्थी को सालाना ₹1,200 का लाभ मिलेगा।
गैर-उज्ज्वला परिवार भी एलपीजी की बाजार आधारित लागत की तुलना में लगभग ₹700 कम भुगतान कर रहे हैं।
एक सिलेंडर की आपूर्ति लागत अब ₹1,600 से अधिक हो गई है, जबकि प्रत्येक घरेलू सिलेंडर पर लगभग ₹700 की अंडर-रिकवरी (हानि) हो रही है।
फरवरी से एलपीजी के लिए सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस (Saudi CP) में लगभग 46% की वृद्धि हुई है।
भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल रहा जिसने होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में व्यवधान के बावजूद अपने ऊर्जा कार्गो की आवाजाही जारी रखी और किसी भी पेट्रोलियम उत्पाद की कमी नहीं होने दी।
घरेलू उपभोक्ताओं को राहत
दिल्ली में एक सामान्य उपभोक्ता 14.2 किलोग्राम का एलपीजी सिलेंडर ₹942 में खरीदता है, जबकि उज्ज्वला लाभार्थी प्रभावी रूप से केवल ₹642 का भुगतान करते हैं। वहीं, इस सिलेंडर की वास्तविक आपूर्ति लागत ₹1,600 से अधिक है।
सरकार अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि का पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाल रही है। एलपीजी की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ी होने के बावजूद घरेलू उपभोक्ताओं को राहत प्रदान की जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी
भारत अपनी एलपीजी आवश्यकता का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसकी कीमत सऊदी अरामको द्वारा निर्धारित सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस (CP) पर निर्भर करती है।
फरवरी 2026 में एलपीजी का सऊदी CP लगभग 543 अमेरिकी डॉलर प्रति टन था।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य में व्यवधान के बाद अप्रैल में यह बढ़कर 775 डॉलर प्रति टन हो गया।
जून 2026 में यह लगभग 790 डॉलर प्रति टन पहुंच गया।
इस प्रकार फरवरी से जून के बीच एलपीजी की अंतरराष्ट्रीय कीमत में लगभग 46% की वृद्धि हुई।
सरकार कितना बोझ उठा रही है?
यदि घरेलू सिलेंडर की कीमत पूरी तरह आयात लागत के आधार पर तय की जाए, तो 14.2 किलोग्राम का सिलेंडर ₹1,600 से अधिक का होगा।
इसके बावजूद:
सामान्य उपभोक्ता ₹942 का भुगतान कर रहे हैं।
उज्ज्वला लाभार्थी प्रभावी रूप से ₹642 का भुगतान कर रहे हैं।
इसका अर्थ है कि सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियां प्रति सिलेंडर लगभग ₹700 का बोझ वहन कर रही हैं।
होर्मुज़ संकट के दौरान भी आपूर्ति जारी रही
होर्मुज़ जलडमरूमध्य से दुनिया के लगभग 20% तेल और भारत के ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा गुजरता है।
संकट के दौरान:
भारत ने अपने ऊर्जा जहाजों की आवाजाही जारी रखी।
भारतीय बंदरगाहों तक कच्चा तेल और एलपीजी की आपूर्ति लगातार पहुंचती रही।
देश में किसी भी पेट्रोलियम उत्पाद की कमी नहीं हुई।
एलपीजी की बॉटलिंग और वितरण सामान्य रूप से चलता रहा।
आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदम
घरेलू एलपीजी उत्पादन में 60% से अधिक वृद्धि की गई।
अमेरिका, कनाडा और अल्जीरिया जैसे देशों से भी एलपीजी की खरीद बढ़ाई गई।
अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों को प्राथमिकता दी गई।
जहां संभव था, उपभोक्ताओं को पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
सब्सिडी वाले घरेलू गैस के व्यावसायिक उपयोग को रोकने के लिए OTP आधारित सत्यापन को लगभग 90% तक बढ़ाया गया।
वित्तीय बोझ
घरेलू एलपीजी पर अंडर-रिकवरी:
पिछले वित्तीय वर्ष में बढ़कर लगभग ₹60,000 करोड़ पहुंच गई।
इससे पिछले वर्ष यह ₹41,338 करोड़ थी।
केंद्र सरकार ने तेल विपणन कंपनियों को ₹30,000 करोड़ के मुआवजे को मंजूरी दी है।
इसके अतिरिक्त, 10.58 करोड़ से अधिक उज्ज्वला लाभार्थियों को प्रति सिलेंडर ₹300 की प्रत्यक्ष नकद सहायता भी दी जा रही है।
निष्कर्ष
फरवरी से जून 2026 के बीच एलपीजी की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में लगभग 46% वृद्धि हुई है, लेकिन भारत में घरेलू उपभोक्ताओं को इसका पूरा प्रभाव नहीं झेलना पड़ा।
सामान्य उपभोक्ता ₹942 में सिलेंडर प्राप्त कर रहे हैं।
उज्ज्वला परिवार ₹642 की प्रभावी कीमत पर सिलेंडर प्राप्त कर रहे हैं।
भारतीय परिवार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका सहित पड़ोसी देशों की तुलना में कम कीमत पर एलपीजी प्राप्त कर रहे हैं।
विकसित देशों जैसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा की तुलना में भी भारत में रसोई गैस काफी सस्ती है।
उपभोक्ताओं से अपील की गई है कि वे इस मूल्यवान ऊर्जा संसाधन का सावधानीपूर्वक उपयोग करें और ऊर्जा-कुशल खाना पकाने की आदतें अपनाएं।


